कांच - सी कठोर स्त्री

उस दिन सुबह से ही पूरे घर में रौनक थी। आयुषी का रिजल्ट जो आया था उसने अपने कॉलेज में टॉप किया था। यह समाचार सुन कर पूरे परिवार की खुशी का ठिकाना न रहा। आयुषी बचपन से ही मेधावी और होनहार छात्रा थी। उसकी योग्यता पर पूरे परिवार को गर्व था। पापा ने उससे पूछा - "बेटा ! अब आगे क्या करना चाहती हो ?" पापा ! मैं उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहती हूं। बेटी का जवाब सुनकर पापा गौरवान्वित हुए।

अचानक फोन की घंटी बजने लगी। आयुषी ने अपना फोन उठाया और हंसती हुई कहने लगी "बेईमानी नहीं .. मैं तुम लोगों को पार्टी जरूर दूंगी।" थोड़ी बातचीत के बाद उसने फोन रख दिया।

मां ने पूछा, "किसको पार्टी दी जा रही है ?" अरे मां ! वो आकाश और उसके दोस्त कह रहे थे कि अपनी सफलता को हमारे साथ सेलिब्रेट नहीं करोगी। बेटा ! यह वही आकाश है ना जो कॉलेज में तुमसे एक साल सीनियर था। आयुषी ने हामी भरते हुए कहा, हां मां! आकाश ने हमेशा पढ़ाई में मेरी बहुत मदद की है इसलिए उसे तो पार्टी देनी ही होगी। मां चिंतित हो उठी। बेटा! आकाश तो सभ्य लड़का है, लेकिन उसके साथ उसके दोस्त भी तो रहेंगे। इतनी रात गए अकेली लड़की का बाहर रहना ठीक नहीं ..!! आयुषी मां के गोद में सिर रखकर सोती हुई बोली - मां ! अब मैं बड़ी हो गई हूं आप इतनी चिंता क्यों करती हैं ?? आप तो जानती ही है कि मैं सिर्फ़ आकाश के लिए जा रही हूं।

आज सुबह से आयुषी बहुत उत्सुक थी, वैसे तो उसे पार्टी में जाना पसंद नहीं था लेकिन आज उसकी आंखों में सुनहरे भविष्य के अनंत सपने मौजूद थे। शाम को आयुषी दोस्तों के साथ पार्टी में चली गई। बहुत रात हो गई थी मां मन ही मन बड़बड़ा रही थी, " ये आजकल के बच्चे इतनी रात तक पार्टी क्यों करते हैं ??" तभी अचानक आयुषी के मोबाइल से किसी अनजान व्यक्ति ने कॉल किया और कहां आप इस पते पर जल्द पहुंचिए हमारे होटल के कमरे में एक बेहोश लड़की पाई गई है। यह सुनकर पूरे परिवार के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। सब अफ़रा-तफ़री में होटल पहुंचे, वहां पहुंच कर देखा आकाश अधमरा पड़ा हुआ है और आयुषी बेहाल। आकाश बेहोशी की हालत में ही चीखने लगा, आंटी हमारी पार्टी में न जाने कहां से कुछ अज़नबी लड़के शामिल हो गए थे, वे आयुषी के साथ बदतमीजी करने लगे। जब मैंने और आयुषी ने विरोध किया तो वे हम पर हमला कर बैठे और मुझे घसीट कर होटल के एक कमरे में रस्सियों से बांध दिया बाद में उसी कमरे में आयुषी को लेकर आए, मुझे सब दिख रहा था लेकिन मैं असमर्थ एवं लाचार था। मेरी आंखों के सामने उन वहशीदरिंदों ने आयुषी के इज्जत को तार-तार किया। उन गुंडों ने हैवानियत की हद पार कर दी। आयुषी चीखती रही लेकिन उसकी आवाज़ सुनने वाला उस वीराने में कोई न था।

आयुषी की हालत ज़्यादा खून बहने के कारण नाज़ुक हो गई थी। उसके शरीर के अंदरूनी हिस्सों से लगातार खून बह रहा था। हम जल्दी से उसे हॉस्पिटल ले गए। आज आयुषी जिंदगी और मौत के बीच लड़ रही है। क्या फिर से हम अपनी चुलबुली आयुषी को देख पाएंगे ?? क्या वह फिर से मुस्कुराएगी ?? कैसी है इस समाज की विडंबना ? जहां एक लड़की को स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार भी नहीं। सच ही कहा गया है कि एक स्त्री कांच की तरह कठोर दिखती है लेकिन वह अंदर से बहुत कोमल होती है। जब वह टूटती है तो कांच की तरह ही चूर-चूर होकर बिखर जाती है।

©अनीता सिंह 'अपराजिता